• "न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते" - ज्ञान के समान पावन इस विश्व में अन्य कोई वस्तु नहीं है।
    "विद्ययाऽमृतमश्नुते" - विद्या या ज्ञानोपासना से ही साधक अमरत्व को प्राप्त करता है।
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Gyanshauryam, International Scientific Refereed Research Journal (GISRRJ) is peer-reviewed, online international journal published monthly by TechnoScience Academy (The International open Access Publisher) GISRRJ is a highly-selective journal, covering topics that appeal to a broad readership of various branches of Applied Science and Technology and related fields. The Journal has many benefits all geared toward strengthening research skills and advancing academic careers.  Journal publications are a vital part of academic career advancement. To maintain a high-quality journal, manuscripts that appear in the GISRRJ Articles section have been subjected to a rigorous review process. This includes blind reviews by one or more members of the international editorial review board, followed by a detailed review by the GISRRJ editors.

"ज्ञानशौर्यम्" पत्रिका साहित्यिक रास-विलास, दार्शनिक चिन्तन की भाव-भूमि विज्ञान तथा ललित कलाओं का अनोखा तीर्थ है, जहाँ सह्दयी-साहित्यिक एवं चिन्तक मनीषी समान रूप से आनन्दानुभूति प्राप्त कर सकते हैं। यह पत्रिका साहित्य, दर्शन, विज्ञान एवं कला के नित्य नूतन प्रयोग से भरा हुआ है। यह ज्ञान-विज्ञान एवं कला की सुन्दर एवं अनुपम वाटिका है, जो अनुसन्धाताओं का मन हठात अपनी ओर खीच लेता है। अध्येताओं, शोधप्रज्ञों, लेखकों एवं चिन्तकों के ज्ञान सम्पदा केा सुरक्षित-संरक्षित, विकसित एवं परिमार्जित करना ही इस पत्रिका का उद्देश्य है।

दीपक चाहे मिट्टी का हो चाहे सेाने का या चाँदी का,मूल्य उसका नहीं, उसकी लौ(प्रकाश) का होता है। ‘‘ज्ञानशौर्यम्’’ का प्रकाशन उसी लौ को अनवरत जलाए रखने के लिए की गई है। इस पत्रिका के माध्यम से रचनात्मक प्रतिभा एवं सृजनात्मक शाक्ति को बढ़ावा देने का प्रायास किया जा रहा है। शोधाधियों के द्वारा इस संसार से प्राप्त अनुभव की परिपक्वता और अभिव्यक्ति की सफाई उनकी रचनाओं में भले ही न मिले, परन्तु भावों की नूतन भंगिमाए और मौलिक दृष्टिकोण जरुर मिलेगा। ‘‘ज्ञानशौर्यम्’’ स्फूट काव्य लेखकों, निबन्धकारों, स्तम्भकरों व गवेषकों के लिए सागर है। शोधार्थी के लिए यह रत्नाकर है, गोताखोर जितनी गहराई में जायेगा, नयें-नये रत्न मिलते ही जायेंगे। यह शोध-पिपासुओं के लिए नवीनता का आग्रही है।

श्री पावका नः सरस्वती वाजेर्भिवाजिनीवती यज्ञं वष्टु धिया वसुः।।

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