पुराणों का दर्शन

Authors(1) :-डाॅ. अराधना उपाध्याय

ज्ञान सम्पन्न व्यक्ति को भी श्रीमद्भागवत नित्य मुक्त’ माना गया है। आत्मादर्शी व्यक्ति प्राकृति पुरूष विवेक से मुक्ति का सहज अधिकारी कहा गया है। द्वितीय स्कन्ध के दूसरे अध्याय में सद्योमुक्ति और क्रममुक्ति का आधार साधना वैषम्य को बताया गया है। अन्त में ‘‘ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः’ का समथ्रन करते हुए स्पष्ट रूप में कहा गया है कि भक्ति की उत्पादिका निस्पृहता ही मुक्ति प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है।

Authors and Affiliations

डाॅ. अराधना उपाध्याय
पूर्व शोध छात्रा, संस्कृत विभाग, महन्थ रामाश्रयदास स्नाकोत्तर महाविद्यालय, भुड़कुड़ा, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश।

पुराण, दर्शन, आत्मदर्शी, क्रममुक्ति, सद्योक्ति, भक्ति, उत्पादिका।

  1. 1.श्री शङ्कर के निर्विशेषाद्वैत के पोषक उपनिषदीय सूत्र निम्न है - छान्दोग्य, 6/2/2, केन., 1/3 मुण्डक, 1/1/7, श्वेता., 4/4/8/10, मुण्डक., 2/2/8ः वृहदारण्यक., 2/2/4, 4/4/12ः ऐतरेय, 5/3ः छान्दोग्य., 6/7/8ः बृहदा., 1/4/10ः माण्डूक्य., 2ः शाङ्करभाष्य, 1/1/4 राजानुजाचार्य के प्रेरक सूत्र - श्वेताश्व, 1/22ः बृहदारण्यक, 2/192, 3/7ः तैत्तिरीय., 2/6ः श्वेता., 6/9ः मुण्डक, 3/1/3 श्रीबल्लभाचार्यजी ने प्रायः उक्त सभी सूत्रों का सार तथा भागवत द्वितीय स्कन्ध के दशम अध्याय से विचार-सूत्र ग्रहण किये हैं। विशेषकर ‘पोषणं तदनुग्रहः 2/10/4 आदि।
  2. अहिर्बुध्न्य संहिता, 14/28-32
  3. श्रीमद्भागवत, 1/5/8-12, 1/7/6-7 तथा 1/4
  4. श्रीमद्भागवत, 12/13/18-19
  5. अथोऽयं ब्रह्मासूत्राणां भारतार्थ विनिर्णयः। गायत्री भाष्य रूपोऽौ वेदार्थ परिबृंहितष्द्व। गरूड़पुराण
  6. श्रीमद्भागवत, 11/21/43
  7. 7.श्रीमतद्भागवत, 1/1/1
  8. 8.श्रीमद्भागवत, 1/1/2-3
  9. 9.मत्स्य, 53/21-22
  10. 10.गरूड़ भागवत महात्म्य (पुराण गणना प्रसङ्ग)
  11. 11.स्कन्द, वैष्णव खण्ड, श्रीमद्भागवत माहात्म्य, अ. 1-4
  12. 12.पद्म, उत्तरखण्ड, अ. 1-6 (श्रीमतद्भागवत माहात्म्य)
  13. 13.नारद पा´्वरात्र की ‘ज्ञानामृतसार संहिता’ द्वितीय सत्र, अ. 7 तथा ‘सात्वत तंत्र द्वितीय पटल,
  14. 14.तदैव, 2/10/1-2
  15. 15.तदैव, 2/5, 3/5, 10, 11, 12, 23, 2/10, 3/26, 11/12, 12/7/6, 3/10/14-17 आदि।
  16. श्रीमद्भागवत, 3/10/14
  17. श्रीमद्भागवत, 3/10/13-25
  18. श्रीमद्भागवत, 3/10/26-29
  19. श्रीमद्भागवत, 12/7/12
  20. श्रीमद्भागवत, 11-12
  21. श्रीमद्भागवत, 3/5/32-35
  22. श्रीमद्भागवत, 2/5/32
  23. श्रीमद्भागवत, 2/6/41
  24. (अ) पुरूषस्य दर्शनार्थ कैवल्यार्थ तथा प्रधानस्य षंगबन्ध वदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः।। सां0 का0 21 असद्कारणादुपादान ग्रहणात् सर्वं सम्भवाभावत् शक्तस्य- शक्य कारणात् कारण भावाच्य सत्कार्यम् ।। सा0का0, 9 (ब) प्रकृतेर्महांस्तत हंकारस्तस्मात् गणश्व षोडशकः। तस्मादपि षेाड्शकात् पंचभ्यः पंचभूतानि।। तदेव, 21.
  25. श्रीमद्भागवत, 2/10/3
  26. श्रीमद्भागवत, 2/10/3
  27. श्रीमद्भागवत, 2/10/4
  28. पोषणंतदनुग्रहः । श्रीमद्भागवत, 2/10/4 पोषण की विस्तृत व्याख्या, भागवत, 6/3 में द्रष्टव्य है।
  29. 29.भागवत, 2/10/4 ‘‘मान्वन्तरं’’ काल परिमाण का नाम है, मानव वर्षों की गणनानुसार 42, 20,000 वर्ष की। चतुर्युगी होती है और 71 चतुर्युगियों का एक मन्वन्तर होता है। भागवत, 8/14
  30. 30.श्रीमद्भागवत, 2/10/4
  31. 31.श्रीमद्भागवत, 2/10/5
  32. 32.श्रीमद्भागवत, 2/10/6 (पूर्वार्द्ध)
  33. श्रीमद्भागवत, 11/14/14 तथा 11/20/32-35
  34. विद्यामयो यः स तु नित्य मुक्त। श्रीमद्भागवत, 11/11/7
  35. श्रीमद्भागवत, 3/27/9-11
  36. श्रीमद्भागवत, 11/20/14, 16, 35 आदि
  37. गीता, 15

Publication Details

Published in : Volume 7 | Issue 5 | September-October 2024
Date of Publication : 2024-10-05
License:  This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
Page(s) : 60-65
Manuscript Number : GISRRJ247510
Publisher : Technoscience Academy

ISSN : 2582-0095

Cite This Article :

डाॅ. अराधना उपाध्याय , "पुराणों का दर्शन", Gyanshauryam, International Scientific Refereed Research Journal (GISRRJ), ISSN : 2582-0095, Volume 7, Issue 5, pp.60-65, September-October.2024
URL : https://gisrrj.com/GISRRJ247510

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