Manuscript Number : GISRRJ258336
परमतत्त्व की दार्शनिक मीमांसा
Authors(1) :-डाॅ0 ऋचा दर्शन अन्तिम सत्य के उद्घाटन का प्रयास करता है पर इस अन्तिम सत्य के स्वरूप के सम्बन्ध में सभी दार्शनिक एक मत नहीं है। किसी दार्शनिक ने अद्वैतवाद की प्रतिष्ठा की है, किसी ने द्वैतवाद और किसी ने अनेकवाद की। द्वैतवाद गुण के आधार पर प्रकृति और पुरुष, जड़ और चेतन दो सत्तायें स्वीकार करता है। स्वरूप की दृष्टि से परमात्मा एक और जीवात्मा अनेक है। अनेकवाद सत्, चित् और आनन्द तीन सत्ताओं का प्रतिपादन करता है। सत् प्रकृति है जिसमें सत्, रज और तम की साम्यावस्था है। इस साम्यावस्था में वैषम्य अथवा विकृति परमात्मा के कारण उत्पन्न होती है, चित्-जीव है जो अनेक है, सच्चिदानन्द परमतत्त्व है। मत वैभिन्न होते हुए भी समस्त दार्शनिकों की प्रकृति एक ऐसी वास्तविकता की ओर गई जो आध्यात्मिक है जो किस भी अस्तित्व की ओर संकेत कर सकता है क्योंकि वह समस्त अस्तित्वों का मूलाधार है।
डाॅ0 ऋचा परमतत्त्व, दार्शनिक, मीमांसा, प्रकृति, अद्वैतवाद, द्वैतवाद। Publication Details Published in : Volume 8 | Issue 3 | May-June 2025 Article Preview
असिस्टेन्ट प्रोफेसर-संस्कृत, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर, भदोही।
Date of Publication : 2025-05-30
License: This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
Page(s) : 447-452
Manuscript Number : GISRRJ258336
Publisher : Technoscience Academy
URL : https://gisrrj.com/GISRRJ258336