प्रेम,औपनिवेशक नैतिकता और वर्जनाओं का विस्फोट : पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की ‘चाकलेट’
Keywords:
पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र', ‘चाकलेट’ विवाद, ‘घासलेट’ शब्द, बनारसीदास चतुर्वेदी, नग्न यथार्थवादAbstract
हिंदी साहित्य का वह कालखंड (1920-1930) केवल राष्ट्रीय आंदोलनों का समय नहीं था, बल्कि वह अपनी जड़ों और पहचान को खोजने का दौर भी था। पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' के 'चाकलेट' ने जिस विवाद की नींव रखी, उसने साहित्य की परिभाषा और उसकी सीमाओं पर एक बहुत बड़ी बहस छेड़ दी थी।'घासलेट' शब्द का प्रयोग सबसे पहले प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार बनारसीदास चतुर्वेदी ने किया था। 'घासलेट' यानी घटिया दर्जे का केरोसिन तेल, जो जलते समय धुआँ बहुत देता है और रोशनी कम। चतुर्वेदी जी का मानना था कि उग्र का साहित्य समाज में ज्ञान की रोशनी फैलाने के बजाय वासना और अनैतिकता का धुआँ फैला रहा है। 1927-28 के दौरान 'विशाल भारत' पत्रिका में उन्होंने उग्र के विरुद्ध एक बाकायदा युद्ध छेड़ दिया था। उनका तर्क था कि उग्र ने समलैंगिकता जैसे विषयों को सुधारने के बहाने जिस विस्तार से लिखा है, वह वास्तव में युवा पाठकों को 'रास्ता दिखाने' के बजाय 'रास्ता भटका' रहा है।
इस विवाद की आंच इतनी तेज थी कि उस समय के बड़े-बड़े दिग्गज इसमें शामिल हो गए। प्रेमचंद ने जहाँ उग्र की भाषा और शैली की प्रशंसा की, वहीं उन्होंने भी नैतिक तौर पर इसे थोड़ा जोखिम भरा माना। बाबू गुलाबराय और आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे विचारकों ने भी साहित्य के इस 'नग्न यथार्थवाद' पर चिंता जताई थी। महात्मा गांधी ने भी इस विवाद पर अपनी राय दी और वे इस बात से दुखी थे कि साहित्य के नाम पर ऐसी चीजें परोसी जा रही हैं जो उनकी दृष्टि में भारतीय संस्कृति के अनुकूल नहीं थीं।
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