स्मृतियों में जीवन दर्शन

Authors

  • डाॅ. ऋचा असिस्टेन्ट प्रोफेसर-संस्कृत, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर, भदोही, उत्तर प्रदेश। Author
  • उष्मा यादव असिस्टेन्ट प्रोफेसर-संस्कृत, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ज्ञानपुर, भदोही, उत्तर प्रदेश। Author

Keywords:

स्मृति, जीवन, दर्शन, आचार, सूत्रकाल, समाविष्ट, समानभाव।

Abstract

आचार ही उत्तम वर्ण है। महाभारत में यह मान्यता व्यक्त की गयी है कि ब्रह्म ने सभी मानवों को समानभाव से उत्पन्न किया था। परन्तु वे अपने अपने कर्मों के अनुरूप वर्णों में विभाजित हो गये। वर्णव्यवस्था के संबंध में विद्वानों का विचार है कि सूत्रकाल में वर्णव्यवस्था भेदपरक तत्वों से समाविष्ट हो गयी और इसमें कर्म की अपेक्षा जल को अधिक महत्व दिया जाने लगा।

References

वेदान्तसूत्र-शांकरभाष्य-1.2

पुरि देहे शेते इति पुरुषः। पुरुषैरथ्र्यते प्राध्र्यते इति पुरुषार्थः।

मनुस्मृति-5/109

धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मनाम्- महा0 शान्तिपर्व 167/9 धर्मो हि परमो लोके- रामायण- 2/21/41

अर्थमूलो हि धर्मकामाविति-अर्थशात्र 1/7/11

मनुस्मृति-2/224

महाभारत शान्तिपर्व-164/40

महाभारत कर्मपर्व-109/58

वैशेषिक सूत्र-1/1/2

मनुस्मृति-2/13

मीमांसासूत्र-1/2

मनुस्मृति-2/6-2

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः गीता-3/35

स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्। गीता 18/48

सहज कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत। गीता-18/42

ज्ञान विज्ञान मास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्। गीता-18/42

मनुस्मृति -12/16

मनुस्मृति-6/92

मिताक्षरा यज्ञ-1/1

अर्थशास्त्र-1/15/1

ईशावस्योपनिषद-1,2

गीता-7/11

मनुस्मृति-6/60

गीता-3/3

गीता-18/66

कामसूत्र-1///1-6

मनुस्मृति-9/336

गीता-4/13

रामायण-3/14/29-30

महाभारत-188/10

भागवतपुराण-12/19-20

ऋग्वेद-10/141/5, 1/164/45

मनुस्मृति-1/88

गीता-18/42

मनुस्मृति-1/90

गीता-18/44

मनुस्मृति-1/191

गीता-18/44

ऋग्वेद-9/112/3

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Published

15-02-2026

Issue

Section

Research Articles

How to Cite

[1]
डाॅ. ऋचा and उष्मा यादव, “स्मृतियों में जीवन दर्शन”, Gyanshauryam Int S Ref Res J, vol. 9, no. 1, pp. 90–96, Feb. 2026, Accessed: Mar. 17, 2026. [Online]. Available: https://gisrrj.com/index.php/home/article/view/GISRRJ269114